The Curse of Toumai : क्या इस शापित खोपड़ी में छिपा है इंसानी विकास का रहस्य?

 


टौमाई की खोज ने मानव उत्पत्ति की कहानी बदल दी, लेकिन इसके साथ ही जन्म लिया टौमाई के श्राप (The Curse of Toumai) ने। uplive24.com पर जानिए 70 लाख साल पुराने इस जीवाश्म का रहस्य, विवाद और मानव विकास से इसका संबंध।

The Curse of Toumai : मानव उत्पत्ति (Human Origins) का रहस्य हमेशा से वैज्ञानिकों और खोजकर्ताओं को आकर्षित करता रहा है। इसी रहस्य की कड़ी में साल 2001 में अफ्रीका के चाड के जुराब रेगिस्तान (Djurab Desert) से मिली एक खोपड़ी ने पूरी वैज्ञानिक दुनिया को हिला दिया। इस जीवाश्म का नाम रखा गया टौमाई (Toumai Fossil), जिसका स्थानीय भाषा में अर्थ है - जीवन की आशा।

लेकिन यह खोज जितनी महान थी, उतनी ही विवादों और ईर्ष्या से भी घिर गई। यही कारण है कि इसे आज टौमाई का श्राप (The Curse of Toumai) कहा जाता है।

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टौमाई कौन था (Who was Toumai)

फ्रांस के पॉयटियर्स यूनिवर्सिटी (Poitiers University) के वैज्ञानिक मिशेल ब्रूनेट (Michel Brunet) ने यह खोपड़ी दुनिया के सामने रखी। जांच में पता चला कि यह 60 से 70 लाख साल पुरानी है। इस प्रजाति को नाम दिया गया साहेलैंथ्रोपस त्चाडेंसिस (Sahelanthropus Tchadensis)।

अगर यह मानव का पूर्वज साबित होता, तो यह अब तक का सबसे पुराना द्विपाद (Bipedal) जीवाश्म होता। इसका मतलब यह होता कि इंसानों की जड़ें सिर्फ पूर्वी अफ्रीका में ही नहीं, बल्कि सहारा रेगिस्तान में भी थीं।

इस खोज के बाद ब्रूनेट रातों-रात वैज्ञानिक सेलिब्रिटी बन गए। उन्हें फ्रांस के राष्ट्रपति तक से सम्मान मिला और चाड की राष्ट्रीय एयरलाइन का नाम तक Toumai रख दिया गया।

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यूं खड़ा हुआ विवाद और बना श्राप (The Curse of Toumai)

  • ब्रूनेट ने खुद को टौमाई का खोजकर्ता घोषित किया, जबकि वास्तविक खोज का श्रेय एक अन्य वैज्ञानिक आलें ब्यूविलेन (Alain Beauvilain) को जाता था। इससे टीम में दरार पड़ गई।
  • ब्यूविलेन का दावा था कि यह खोपड़ी खुदाई से नहीं, बल्कि सतह पर मिली थी। इसके ऊपर रेगिस्तानी परत जमी थी। इसका मतलब था कि इसकी उम्र और प्रामाणिकता पर सवाल उठ सकते थे।
  • 2003 में टौमाई की जांघ की हड्डी मिली। कई वैज्ञानिकों का मानना था कि यह इंसानों जैसी नहीं बल्कि चिंपैंजी जैसी है यानी यह बाइपेडल (दो पैरों पर चलने वाला) नहीं था। लेकिन ब्रूनेट ने इस हड्डी को नजरअंदाज करने का आदेश दिया।
  • 2009 में ब्यूविलेन ने एक और सनसनीखेज दावा किया। उन्होंने कहा कि टौमाई की खोपड़ी (The Curse of Toumai) किसी खानाबदोश ने दफनाई थी, क्योंकि हड्डियां मक्का की दिशा में एक खास पैटर्न में रखी गई थीं। यह 11वीं सदी के इस्लामिक प्रभाव की ओर इशारा करता था। इससे टौमाई की प्राचीनता पर सवाल उठा। 
  • धीरे-धीरे वैज्ञानिकों के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि नेचर जैसी जानी-मानी वैज्ञानिक पत्रिका तक ने कह दिया कि टौमाई (The Curse of Toumai) पर कोई सेशन नहीं होगा, क्योंकि यह विवादास्पद है।
  • ब्रूनेट ने मजाक में कहा - टौमाई को छूने वाला पागल हो जाता है। लेकिन यह मजाक हकीकत बन गया। उनके सहयोगी बिखर गए, और उनकी साख पर सवाल उठने लगे। 

यही है टौमाई का श्राप (The Curse of Toumai) - एक ऐसी खोज, जो जितनी क्रांतिकारी थी, उतनी ही विनाशकारी।

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विज्ञान के लिए टौमाई का महत्व

विवादों (The Curse of Toumai) के बावजूद टौमाई बेहद महत्वपूर्ण खोज है।

यह मानव विकास (Human Evolution) की टाइमलाइन को पश्चिमी अफ्रीका तक खींचता है। खोपड़ी के संरचना से संकेत मिलता है कि यह सीधा चल सकता था, हालांकि फीमर बोन पर अब भी बहस है।

इतने पुराने जीवाश्म बेहद दुर्लभ हैं और यही कारण है कि टौमाई को विज्ञान में खजाने की तरह देखा जाता है।

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