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Mughal History : मुगल राजकुमारी जो अगवा होने के बाद दासी बनी और फिर संत

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https://uplive24.com/ https://uplive24.com/princess-from-mughal-history-who-kidnapped-and-became-maid-and-saint/ मुगल इतिहास (Mughal History) से जुड़े एक पन्ने पर मीरा का भी नाम है। यह मीरा भी संत थी और जिसने भारत-मैक्सिको को जोड़ने का काम किया। कल्पना कीजिए - किसी भारतीय राजकुमारी को 9 साल की उम्र में अगवा कर लिया जाए, गुलाम बनाकर हजारों मील दूर एक अनजाने देश में बेच दिया जाए, लेकिन वही लड़की एक दिन उस देश की सबसे पूजनीय 'संत' बन जाए, और जिस घर में उसने आखिरी सांस ली, वो आज एक लग्जरी होटल बन जाए! जी हां, यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि इतिहास की उन भूली-बिसरी परतों में दर्ज एक हकीकत है, जो भारत और मैक्सिको (Mexico) को एक भावनात्मक रेखा से जोड़ती है। और इस कड़ी का नाम है मीरा (Mira), जिसे मैक्सिको में कैटरिना डे सैन युआन (Catarina de San Juan) या चाइना पोब्लाना (China Poblana) के नाम से जाना जाता है। इसका एक सिरा मुगल इतिहास (Mughal History) से भी जुड़ता है। एक होटल, जिसमें बसी है इतिहास की आत्मा मैक्सिको के प्यूबला (Puebla) शहर में एक आलीशान होटल है - कसोना दे ला चाइना पोब्लान...

Rana Sanga : अपनों ने दगा दिया, वरना बाबर में कहां दम था

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https://uplive24.com/rana-sanga-was-betrayed-by-his-own-people-in-the-war-against-mughal-babur/ सपा सांसद रामजी सुमन के राणा सांगा (Ramji Lal Suman on Rana Sanga) पर दिए बयान पर बवेला मचा हुआ है। रामजी सुमन के मुताबिक, राणा सांगा ने ही इब्राहिम लोदी (Rana Sanga and Ibrahim Lodhi) को हराने के लिए बाबर को बुलाया था। अगर इतिहास देखें तो पता चलता है कि हिंदुस्तान में कदम जमाने की कोशिश कर रहे बाबर को असली टक्कर राणा सांगा ने ही दी थी। बाबर (Babur) के पहले जो भी आक्रांता भारत आए थे, उन्होंने देश को लूटा, मारकाट की और चले गए। लेकिन बाबर ने फैसला किया कि वह हिंदुस्तान में मुगल सल्तनत की नींव रखेगा। इसमें सबसे बड़ा रोड़ा राणा सांगा ही थे। राणा सांगा (Rana Sanga) उस समय मेवाड़ के सबसे शक्तिशाली शासक थे और उनकी सेनाएं उत्तरी और पश्चिमी भारत में फैली हुई थीं। उनकी शक्ति सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनका प्रभाव गुजरात, मालवा, दिल्ली और आगरा तक था। उनके नेतृत्व में मारवाड़, अंबर, ग्वालियर, अजमेर और चंदेरी जैसे राज्यों के राजपूत शासक एकजुट थे। सांगा के रहते बाबर का सपना कभी पूरा नहीं हो सक...

Mughal History : भारतीय महिलाओं का वह गहना जिसे देखकर पीछे हट जाते थे मुगल

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https://uplive24.com/how-dholna-save-women-from-mughals/ भारतीय संस्कृति में सुहागिनों के आभूषणों का एक विशेष स्थान है, और उनमें से एक है ढोलना, जिसकी परंपरा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में विशेष रूप से देखी जाती है। विवाह की रस्में इस गहने के बिना अधूरी मानी जाती हैं। मान्यता है कि यह केवल श्रृंगार का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जरूरत से उपजी परंपरा भी है। मुगल काल (Mughal History) के दौरान, जब आक्रमणों की मार भारतीय समाज पर गहरी पड़ रही थी, तब अनेक परंपराओं का जन्म हुआ। कहा जाता है कि विवाह के बाद जब कन्या की विदाई होती, तो रास्ते में मुगल सैनिक नवविवाहिताओं को अगवा कर लेते थे। इस अत्याचार से बचने के लिए एक युक्ति निकाली गई - ढोलना पहनने की परंपरा।  इस आभूषण को एक विशेष अर्थ और रूप दिया गया। यह अफवाह फैलाई गई कि इस ढोल के आकार के गहने में सूअर के बाल भरे जाते हैं। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, सूअर को अपवित्र माना जाता था, जिससे मुगल सैनिक इन स्त्रियों को छूने से भी कतराते। इस प्रकार, ढोलना केवल एक गहना नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का प्रतीक बन गया। आज भी, विवाह की परंपरा में...

Aurangzeb : एलोरा की गुफाएं देख औरंगजेब को क्यों याद आए जिन्न

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https://uplive24.com/why-did-aurangzeb-remember-jinn-after-seeing-the-ellora-caves/ औरंगजेब (Aurangzeb) लंबे समय तक औरंगाबाद (अब संभाजी नगर) में रहा। इस दौरान उसने जब एलोरा की गुफाएं देखीं, तो चौंक उठा। छत्रपति संभाजी नगर (पहले औरंगाबाद) के साथ औरंगजेब (Aurangzeb) का रिश्ता उतार-चढ़ाव भरा रहा। कह सकते हैं कि औरंगजेब आखिरी प्रभावशाली मुगल शासक था और उसकी विरासत पर प्रभाव पड़ा इस शहर का। इतिहास से पता चलता है कि उसने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा औरंगाबाद में बिताया। पहले एक सूबेदार के रूप में और फिर शासक के रूप में।  औरंगजेब (Aurangzeb) का असर यहां आज भी दिखता है। फिर चाहें वे महल हों, बाजार, झील, मस्जिद या फिर मंदिर। अतीत के ये अवशेष पूरे शहर में बिखरे हुए हैं, जिसे द्वारों का शहर कहते हैं।  औरंगाबाद का एक प्रमुख स्थल है बीबी का मकबरा। यहां औरंगजेब (Aurangzeb) की पत्नी दिलरस बानो की कब्र है। बादशाहनामा के मुताबिक, इसका निर्माण 1652 से 1660 ईसवी के बीच कराया गया। आधिकारिक दस्तावेजों से पता चलता है कि औरंगजेब को पहली बार 1636 में सूबेदार की जिम्मेदारी देकर दक्कन भेजा गया था। वह यह...