पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच कैसे खींची गई डूरंड रेखा?

डूरंड लाइन 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच खींची गई सीमा है, जो आज अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच विवाद का कारण बनी हुई है। uplive24.com पर जानिए इस सीमा का इतिहास (Durand Line History), डूरंड समझौते की कहानी, और क्यों यह रेखा अब भी दोनों देशों के बीच तनाव की वजह बनी हुई है।

Durand Line History : जब अंग्रेज अफगानिस्तान की पहाड़ियों और पंजाब की वादियों में अपनी सीमाएं तय कर रहे थे, तब शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि एक रेखा आने वाले सौ वर्षों तक उपमहाद्वीप की राजनीति और हिंसा दोनों को दिशा देगी। यह रेखा थी डूरंड लाइन (Durand Line), जो 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच खींची गई थी। 

उस समय ब्रिटिश सरकार के विदेश सचिव सर हेनरी मॉर्टिमर डूरंड (Sir Henry Mortimer Durand) और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान (Abdur Rahman Khan) के बीच हुए समझौते ने इसे जन्म दिया।

आज यह सीमा अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की 2,640 किलोमीटर लंबी विभाजन रेखा है, लेकिन अफगानिस्तान आज भी इसे स्वीकार नहीं करता। यही वजह है कि यह रेखा आज भी विवाद, अविश्वास और हिंसा का प्रतीक बनी हुई है।

1893 में खींची गई यह सीमा आज भी दुनिया की सबसे अस्थिर सीमाओं में गिनी जाती है। इस रेखा पर फिर से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हिंसा भड़क उठी है। अफगान सरकार ने पाकिस्तान पर हवाई हमलों का आरोप लगाया, जिसके जवाब में तालिबान ने पाकिस्तान के फ्रंटियर कोर (Frontier Corps) पर पलटवार किया। 

यह टकराव नया नहीं है। डूरंड रेखा उस घाव की तरह है, जो समय-समय पर भरने से पहले ही फिर से हरा हो जाता है।

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कैसी है यह सीमा?

डूरंड रेखा का इलाका यानी दक्षिण-पूर्वी अफगानिस्तान और उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान मुख्य रूप से पहाड़ी और शुष्क है। यहां की जमीन ऊबड़-खाबड़ है, सड़कें बहुत कम हैं और कई जगहें अब भी पहुंच से दूर हैं।

यहीं पर सात प्रमुख जनजातीय इलाके - खैबर, बाजौर, मोहम्मद, ओरकजई, कुर्रम, उत्तर वजीरिस्तान और दक्षिण वजीरिस्तान।

इन इलाकों के लोग पीढ़ियों से एक ही भाषा, संस्कृति और खून साझा करते आए हैं - लेकिन 1893 के बाद से वे दो देशों में बंट गए (Durand Line History)।

डूरंड समझौते की कहानी (Durand Line History)

19वीं सदी के आखिरी दशक में ब्रिटिश भारत और रूस के बीच मध्य एशिया में वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी। इसे ‘द ग्रेट गेम’ कहा जाता है। उस समय अफगानिस्तान इस भू-राजनीतिक शतरंज का केंद्र था।

ब्रिटिश भारत चाहता था कि अफगानिस्तान उसके और रूस के बीच एक बफर जोन (Buffer Zone) का काम करे। इसी रणनीति के तहत 1893 में डूरंड को काबुल भेजा गया (Durand Line History)।

अब्दुर रहमान खान उस समय अफगानिस्तान के अमीर थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वह बुद्धिमान, लेकिन शकी थे।

वार्ता के दौरान ब्रिटिशों ने अमीर को वार्षिक अनुदान बढ़ाने का प्रस्ताव दिया और बदले में अब्दुर रहमान ने कंधार से लेकर वजीरिस्तान तक के कई इलाकों पर अपना दावा छोड़ दिया। 

12 नवंबर 1893 को यह समझौता हस्ताक्षरित हुआ और इसी दिन पैदा हुई वह सीमा जिसे आज हम डूरंड लाइन कहते हैं (Durand Line History)।

इस समझौते के बाद, सीमा के दोनों ओर रहने वाले पश्तून (Pashtuns) दो हिस्सों में बंट गए । आधे ब्रिटिश भारत के अधीन और आधे अफगानिस्तान में।

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पश्तून इस इतिहास (Durand Line History) को स्वीकार नहीं करते

पश्तून जनजातियां उस जमाने से ही इस रेखा को अस्वीकार करती आई हैं। उनके लिए यह कोई भौगोलिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विभाजन है।

एक परिवार का आधा हिस्सा अफगानिस्तान में और बाकी पाकिस्तान में रहता है। वे एक-दूसरे से शादी करते हैं, व्यापार करते हैं, और त्योहार साझा करते हैं, लेकिन कागजों में वे दो देशों के नागरिक कहलाते हैं।

अनुमानों के मुताबिक, 3.5 करोड़ से अधिक पश्तून अफगानिस्तान और पाकिस्तान में रहते हैं। अफगानिस्तान की लगभग 42% आबादी और पाकिस्तान की 15% आबादी पश्तून है।

20वीं सदी के मध्य में पश्तूनों ने ‘पश्तूनिस्तान आंदोलन’ भी चलाया, जिसमें उन्होंने एक स्वतंत्र राज्य की मांग की थी। हालांकि यह आंदोलन राजनीतिक अस्थिरता और पड़ोसी दबावों में खो गया, लेकिन उसकी गूंज आज भी सीमा के दोनों ओर सुनाई देती है।

1947 के बाद की सियासत और तनाव

जब 1947 में पाकिस्तान बना, तो अफगानिस्तान ने सबसे पहले इस नई सीमा पर सवाल उठाया। काबुल चाहता था कि पाकिस्तान के पश्तूनों को यह अधिकार दिया जाए कि वे तय करें - क्या वे पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहते हैं या अफगानिस्तान का। (Durand Line History)

यह प्रस्ताव ब्रिटेन और पाकिस्तान दोनों ने ठुकरा दिया। इसके बाद अफगानिस्तान ने डूरंड रेखा (Durand Line History) को मानने से इंकार कर दिया। 1950 और 1960 के दशक में यही असहमति दोनों देशों के बीच तनाव और सीमाई झड़पों का कारण बनी।

कोल्ड वॉर के दौरान स्थिति और पेचीदा हो गई। पाकिस्तान अमेरिका के साथ जुड़ा, जबकि अफगानिस्तान ने सोवियत संघ (USSR) का हाथ थाम लिया। इससे दोनों देशों के बीच की दूरी और बढ़ गई।

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पाकिस्तान ने खड़ी की दीवार

2017 से पाकिस्तान ने डूरंड लाइन (Durand Line History) पर बाड़ लगानी शुरू कर दी। पाकिस्तान ने कहा कि इससे आतंकवाद, तस्करी और अवैध प्रवास पर रोक लगेगी। 2023 तक इस फेंसिंग का 98% हिस्सा पूरा कर लिया गया।

लेकिन अफगानिस्तान और सीमा पर बसे पश्तून समुदायों के लिए यह कदम जख्म पर नमक साबित हुआ। इस बाड़ ने कई परिवारों को बांट दिया, व्यापारिक रास्ते बंद कर दिए, और पुरानी सामाजिक कड़ियों को तोड़ दिया।

काबुल ने इसे पाकिस्तान की उकसाने वाली कार्रवाई बताया, जबकि इस्लामाबाद इसे अपनी सुरक्षा नीति कहता रहा।

एक बार फिर यह रेखा (Durand Line History) सुलग उठी है। पाकिस्तान मनमानी कर रहा है, लेकिन इतिहास गवाह है कि अफगानिस्तान को कभी कोई रेखा बांध नहीं पाई।

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