ज्वालामुखी, जो नींद से जागे तो दुनिया बदल गई
Volcano eruption : ज्वालामुखी उस दैत्य की तरह हैं, जो कब जग जाएं, पता नहीं। विसुवियस से लेकर टम्बोरा तक - जब भी ज्वालामुखी फटे, इन्होंने सभ्यताओं को बदल दिया। upive24.com पर पढ़ें इतिहास को बदलने वाले ज्वालामुखियों के बारे में।
Volcano eruption : कभी-कभी धरती बिल्कुल शांत दिखाई देती है, जैसे उसके भीतर कुछ भी नहीं चल रहा। लेकिन उसकी सतह के नीचे लावा, गैस और गर्मी का एक पूरा संसार धड़कता रहता है। कुछ ज्वालामुखी तो हर कुछ साल या कुछ दशकों में फटते हैं, पर दुनिया में ऐसे भी कई ज्वालामुखी हैं जो हजारों वर्षों की नींद के बाद अचानक जागते हैं। और जब ऐसे सोए हुए दैत्य उठते हैं, तो सभ्यताओं के नक्शे तक बदल जाते हैं।
इथियोपिया का Hayli Gubbi भी ऐसा ही एक ज्वालामुखी है, जो करीब 10,000 साल बाद फटा और उसकी राख भारत तक पहुंच गई। यह घटना हमें उन बड़े ऐतिहासिक विस्फोटों की याद दिलाती है जब निष्क्रिय पड़े ज्वालामुखियों ने अचानक दुनिया को हिला दिया (Volcano eruption)।
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विसुवियस की वह भयानक सुबह
79 ईस्वी में फटा इटली का Mount Vesuvius दुनिया की सबसे दुखद कहानियों में से एक है। यह ज्वालामुखी लगभग 1800 ईसा पूर्व के बाद करीब दो हजार साल तक बिल्कुल शांत पड़ा रहा। इतने लंबे समय तक कोई हलचल न देखकर रोमन लोगों ने उसे एक सुरक्षित पहाड़ मान लिया था। उसकी ढलान पर दो खूबसूरत शहर बस गए - पोम्पेई और हरकुलेनियम। किसी को जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह शांत दिखने वाला पहाड़ अपने भीतर कैसी आग दबाकर बैठा है (Volcano eruption)।
24 अगस्त, 79 ईस्वी का दिन इन शहरों के लिए हमेशा के लिए ठहर गया। दोपहर के समय जमीन अचानक कांपने लगी और कुछ ही पलों में विसुवियस ने आसमान की ओर 33 किलोमीटर ऊंचा राख और पत्थरों का बादल उगल दिया। सूरज गायब हो गया, दिन रात में बदल गया, और कुछ ही घंटों में पोम्पेई राख के पहाड़ के नीचे दबने लगा। अगले 24 घंटे में शहर पूरी तरह दफन हो गया।
आज जब पुरातत्वविद पोम्पेई को खोदते हैं, तो वहां समय जैसे रुक गया हो। कोई रसोई में रोटी सेकते हुए मिला, कोई अपने घर में सोते हुए, कोई भागने की कोशिश में। चेहरों के भाव, शरीर की मुद्राएं - सब उसी दिन की तरह जमे हुए। अनुमान है कि 16,000 से 20,000 लोग इस आपदा में मारे गए।
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माउंट टम्बोरा, जिसने दुनिया का मौसम बदल गया
1815 में इंडोनेशिया के सुंबावा द्वीप पर Mount Tambora फटा (Volcano eruption)। उससे पहले उसका आखिरी बड़ा विस्फोट करीब 5,000 साल पहले हुआ था। 10 अप्रैल 1815 को इतना जोर से फटा कि आवाज 2,600 किलोमीटर दूर तक सुनी गई। 1.7 मिलियन टन राख और गंधक आसमान में गई। ज्वालामुखी का ऊपरी हिस्सा ही उड़ गया - ऊंचाई 4,300 मीटर से घटकर 2,850 मीटर रह गई।
दुनिया भर में 1816 को बिना गर्मी का साल कहा गया। यूरोप और अमेरिका में बर्फबारी जून-जुलाई में हुई, फसलें बर्बाद, भुखमारी। अनुमान है कि दुनिया भर में 71,000 से 1 लाख से ज्यादा लोग सीधे-परोक्ष मरे। आज तक का दर्ज सबसे शक्तिशाली विस्फोट।
क्राकातोआ का धमाका पूरी दुनिया ने सुना
इंडोनेशिया का क्राकातोआ लगभग 1,600–2,000 साल तक बिल्कुल शांत पड़ा रहा था। लोग सोच चुके थे कि यह शायद हमेशा के लिए थम गया है। लेकिन 1883 में अचानक उसने आंखें खोलीं और कुछ ही दिनों में चार ऐसे धमाके किए कि दुनिया दहल उठी (Volcano eruption)।
आखिरी विस्फोट इतना भयानक था कि धरती के इतिहास में दर्ज सबसे तेज आवाज बनी - करीब 310 डेसिबल! यह धमाका इतना जोरदार था कि 3,000 किलोमीटर दूर ऑस्ट्रेलिया तक उसकी आवाज सुनी गई।
इस विस्फोट ने सिर्फ पहाड़ नहीं तोड़ा, पूरी दुनिया को हिला दिया (Volcano eruption)। करीब 36,000 लोग मारे गए, जिनमें से ज्यादातर लोग सुनामी की लहरों की चपेट में आए। ज्वालामुखी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा समुद्र में समा गया, मानो किसी ने पूरा पहाड़ ही मिटा दिया हो।
इस घटना का असर सिर्फ इंडोनेशिया तक सीमित नहीं रहा। विस्फोट से निकली राख पूरी दुनिया में फैल गई। अगले दो साल तक दुनिया के अलग-अलग देशों में सूर्यास्त का रंग गहरा लाल और चमकदार नारंगी दिखाई देता रहा। लोग उस समय समझ ही नहीं पाए कि आसमान का रंग अचानक इतना बदल क्यों गया।
नोवोरुप्ता ने अमेरिका को कंपा दिया था
नोवोरुप्ता का 1912 वाला विस्फोट अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी ज्वालामुखीय घटनाओं (Volcano eruption) में गिना जाता है। यह ज्वालामुखी अलास्का में है और हजारों साल से बिल्कुल शांत पड़ा हुआ था।
6 जून 1912 को अचानक धरती हिली और नोवोरुप्ता फट पड़ा। अगले 60 घंटों में इसने इतनी राख और प्यूमिस उगली कि आसमान ही गायब हो गया। माना जाता है कि राख का गुबार 15 किलोमीटर से भी ऊंचाई तक उठ गया।
इस विस्फोट का असर आसपास की बस्तियों पर साफ दिखा। कोडियाक शहर 30 सेंटीमीटर मोटी राख में पूरी तरह दब गया। हालत यह थी कि लोग दिन में भी मोमबत्ती जलाकर चलते थे, क्योंकि सूरज का प्रकाश जमीन तक पहुंच ही नहीं पाता था।
खुशकिस्मती से यह इलाका बहुत कम आबादी वाला था, इसलिए सीधी जानहानि कम हुई। लेकिन शक्ति के स्तर पर यह धमाका इतना बड़ा था कि इसे 20वीं सदी का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट (Volcano eruption) माना जाता है।
हिमालय पर उनका सामना किससे हुआ था?
इंसानी सभ्यता को पहली बार आंखें दिखाईं चैटेन ने
चैटेन ज्वालामुखी 9,000 साल तक सोया रहा, मानो दुनिया से कोई मतलब ही न हो। फिर 2008 में एक दिन अचानक वह जागा (Volcano eruption) और सबको हैरान कर दिया।
दक्षिणी चिली में बसे इस ज्वालामुखी ने पहले तो हल्की कंपनें दीं, फिर कुछ ही घंटों में 20 किलोमीटर ऊंचा राख का बादल आसमान में उठ गया (Volcano eruption)। वैज्ञानिकों ने कार्बन डेटिंग करके पता लगाया कि इसका पिछला बड़ा विस्फोट करीब 9,400 साल पहले हुआ था। यानी यह ज्वालामुखी तो इंसानी सभ्यता के जन्म से भी पहले शांत हो गया था।
चैटेन का आसपास का इलाका कम आबादी वाला था, इसलिए जैसे ही हलचल शुरू हुई, गांवों को खाली करा लिया गया। इस वजह से जान का बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन राख और धुएं ने लंबे समय तक आसमान को धुंधला बनाए रखा।

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