म्यूचुअल फंड सही है, पर रिस्क भी है
Mutual fund risks : म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय कौन-कौन से जोखिम होते हैं और पोर्टफोलियो को कब और कैसे रीबैलेंस करना चाहिए? जवाब uplive24.com पर। सही रणनीति, कम फंड और साफ लक्ष्य के साथ अपने निवेश को सुरक्षित और बेहतर बनाएं।
Mutual fund risks : म्यूचुअल फंड में निवेश करना आज के समय में धन बढ़ाने का एक लोकप्रिय तरीका बन चुका है। लोग इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि यह छोटे निवेशकों को भी बड़े और विविध बाजारों में हिस्सा लेने का मौका देता है।
लेकिन सच यह भी है कि म्यूचुअल फंड पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते। बाजार की उठापटक, राजनीतिक माहौल, महंगाई, ग्लोबल इकोनॉमिक घटनाएं - ये सब आपकी कमाई पर असर डालते हैं। इसलिए निवेश करने से पहले जोखिमों को समझना और समय-समय पर अपने पोर्टफ़ोलियो को संतुलित करना बहुत जरूरी है।
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म्यूचुअल फंड में किस तरह के रिस्क (Mutual fund risks) होते हैं?
सबसे पहले बात करते हैं उन जोखिमों की, जिनसे अक्सर निवेशक अनजान रहते हैं।
बाजार का जोखिम हर निवेशक को प्रभावित करता है। देश की अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है, ब्याज दरें क्या हैं, अंतरराष्ट्रीय हालात और राजनीतिक फैसले - ये सब मिलकर बाजार को ऊपर भी ले जाते हैं और नीचे भी गिरा देते हैं। यदि बाजार स्थिर है, तो आपकी कमाई बढ़ सकती है, लेकिन अगर उतार-चढ़ाव बढ़ जाए तो रिटर्न भी प्रभावित होते हैं।
एक दूसरा जोखिम है कन्सेंट्रेशन रिस्क। जब पूरा पैसा एक ही सेक्टर या थीम में लगा दिया जाए। उदाहरण के लिए, यदि आपकी पूरी राशि किसी एक उद्योग पर टिकी है और वह उद्योग मुश्किल में आ जाए, तो आपका पोर्टफोलियो भी डगमगा जाता है। इसलिए विविधता यानी डाइवर्सिफिकेशन बेहद जरूरी है।
डेब्ट फंड में इंटरेस्ट रेट रिस्क (Mutual fund risks) आम है। ब्याज दरें बढ़ती हैं तो डेब्ट फंड की वैल्यू गिर जाती है। वहीं, महंगाई बढ़ जाए तो इन्फ्लेशन रिस्क आपकी वास्तविक कमाई को कम कर देता है।
कभी-कभी म्यूचुअल फंड समय पर अपनी होल्डिंग्स बेच नहीं पाते, इस स्थिति को लिक्विडिटी रिस्क कहते हैं। वहीं क्रेडिट रिस्क तब पैदा होता है जब किसी कंपनी के बॉन्ड में निवेश किया गया हो और वह कंपनी समय पर ब्याज या मूलधन चुकाने में नाकाम हो जाए।
इन सभी जोखिमों (Mutual fund risks) के बावजूद म्यूचुअल फंड खराब विकल्प नहीं हैं। सही रणनीति अपनाकर, समय पर बदलाव करके और केवल विश्वसनीय सलाह लेकर आप इन जोखिमों को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
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कैसे करें अपने म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो का सही रीबैलेंस?
अधिकतर लोग धीरे-धीरे इतने फंड खरीद लेते हैं कि पूरा पोर्टफोलियो एक भीड़ जैसा दिखने लगता है। देखने में विविध लगता है, पर व्यवहार में वही दोहराव और भारी खर्च लेकर आता है। इसलिए जरूरी है कि खरीदने के साथ-साथ यह भी तय करें कि क्या बेचना है और कब बेचना है (Mutual fund risks)।
सबसे पहले लक्ष्य के आधार पर निर्णय लें
किसी भी फंड को बेचने का पहला कारण सिर्फ और सिर्फ आपकी जरूरत होनी चाहिए। अगर किसी लक्ष्य - जैसे घर की डाउन पेमेंट, बच्चों की फीस, शादी या किसी आपात स्थिति के लिए पैसे चाहिए, तो जितनी जरूरत है उतना बेच दीजिए। लेकिन अगर कोई तत्काल आवश्यकता नहीं है, तो सिर्फ बाजार की खबरों या अस्थायी उतार-चढ़ाव के कारण फंड बेच देना सही नहीं है।
कमजोर प्रदर्शन करने वाले फंड को छोड़ें
हर साल कुछ फंड चमकते हैं और कुछ फीके पड़ जाते हैं। इनके पीछे भागने से बेहतर है कि डेटा पर भरोसा किया जाए। अगर कोई फंड लगातार 5 साल तक अपने बेंचमार्क और अपनी कैटेगरी औसत दोनों से कम रिटर्न दे रहा है, तो वह आपके पोर्टफोलियो के लायक नहीं है (Mutual fund risks)।
जैसे, यदि किसी मिडकैप फंड ने 24–25% CAGR दिया, लेकिन उसका बेंचमार्क 27–28% था और कैटेगरी औसत भी उससे ऊपर था, तो यह साफ संकेत है कि फंड पीछे रह गया है।
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अपने निवेश स्टाइल से मेल न खाने वाले फंड से दूरी बनाएं
हर फंड का एक स्वभाव होता है। कुछ वैल्यू स्टाइल में चलते हैं और लंबे समय तक कम रिटर्न देते हुए अचानक अच्छा प्रदर्शन करते हैं। वहीं ग्रोथ फंड तेजी के साथ चलते हैं लेकिन इनके उतार-चढ़ाव भी बहुत ज्यादा होते हैं।
अगर आपका स्वभाव स्थिरता पसंद करता है, तो बहुत हाई-वोलैटिलिटी फंड आपको बेचैन कर देगा। इसलिए फंड चुनते वक्त यह ध्यान रखें कि वह आपके मन की शांति के खिलाफ न जाए।
पोर्टफोलियो ओवरलैप कम करें
कभी-कभी हम अलग-अलग नामों वाले फंड खरीदते रहते हैं लेकिन उनमें 50–60% तक एक जैसे शेयर होते हैं। ऐसे में लगता तो है कि पोर्टफोलियो विविध है, लेकिन हकीकत में वही पुरानी कंपनियां बार-बार दोहराई जाती हैं।
यदि दो फंड में ओवरलैप बहुत ज्यादा है, तो उनमें से खर्च वाला या कमजोर फंड बेच देना समझदारी है। (Mutual fund risks)
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फंड का आकार भी मायने रखता है
बहुत बड़े AUM वाले स्मॉल-कैप और मिड-कैप फंड समय के साथ अपनी रणनीति बदलने लगते हैं। जैसे, अगर कोई स्मॉल-कैप फंड बहुत बड़ा हो जाए, तो वह मजबूरी में बड़े शेयर खरीदने लगता है, जो उसकी असली पहचान को कमजोर करता है। ऐसे फंडों पर नजर रखें और देखें कि 80% निवेश सही कैटेगरी में है या नहीं।
इसी तरह, यदि किसी फंड के सिर्फ तीन सेक्टर ही पूरे पोर्टफोलियो का 60% हिस्सा ले रहे हैं, तो उसका मूड बाजार पर बहुत निर्भर हो जाएगा। वहीं, अगर किसी फंड में 80–100 शेयर हैं, तो वह लगभग इंडेक्स जैसा ही हो जाता है।
कुल मिलाकर यह समझिए कि एक अच्छा पोर्टफोलियो रातों-रात नहीं बनता। धीरे-धीरे समझदारी से रीबैलेंस किया गया पोर्टफोलियो ही लंबे समय में स्थिरता और रिटर्न दोनों देता है। कोशिश यह होनी चाहिए कि तीन या चार फंड ही आपके लक्ष्य, जोखिम क्षमता और समय-सीमा को सही तरीके से दर्शाएं।

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