क्या परमाणु बम भी खो सकते हैं?

 

अमेरिका ने वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप किया है तो लोग इतिहास याद कर रहे कि वॉशिंगटन ने कब-कब इस तरह की गुस्ताखियां की हैं। लेकिन, कुछ घटनाएं ऐसी भी हैं, जो आती तो गुस्ताखी की श्रेणी में हैं, लेकिन उन्हें छिपाया गया। परमाणु बम को खो देना, क्या सुना है कभी? क्या परमाणु बम भी खो सकते हैं, किसने और कैसे खोए परमाणु बम, क्या ये बम अब भी फट सकते हैं, क्या है ब्रोकन ऐरो - इन सवालों के जवाब में पढ़िए इतिहास से एक रोचक कहानी uplive24.com पर।

फ्रांसिस्को सिमो ऑर्ट्स हर दिन अपनी छोटी-सी नाव में बैठकर उतर जाते भूमध्य सागर में, मछलियां पकड़ने। स्पेन के जिस टाउन पालोमारेस (Palomares) में घर था उनका, वहां का मुख्य काम ही यही था। मछलियां पकड़ना और खेती। 17 जनवरी 1966 की सुबह भी वह नाव में बैठे जाल में मछलियों को फंसाने का इंतजाम कर रहे थे। ठीक उसी समय, उनके ऊपर आसमान में करीब साढ़े 9 हजार मीटर की ऊंचाई पर एक घटना घटने जा रही थी।

सोवियत संघ के खिलाफ शीत युद्ध को देखते हुए अमेरिकी सेना हर समय अलर्ट पर रहती थी तब। उसकी एयरफोर्स भी, जिसके विमान हर वक्त आकाश में चक्कर काटा करते, ताकि जंग के हालात में मास्को पर पहला वार किया जा सके। इसे नाम दिया गया था ऑपरेशन क्रोम डोम। 

अरब के रेगिस्तान में जब पड़े सबसे पुराने कदम

उस दिन इस ऑपरेशन के तहत उड़ान पर था अमेरिकी एयरफोर्स का बॉम्बर B-52G। सुबह के साढ़े 10 बजे रहे थे। बॉम्बर को जरूरत थी ईंधन की। हवा में ही टैंक रिफ्यूल करने के लिए B-52G ने संपर्क किया टैंकर KC-135 से। दोनों यह काम पहले भी कर चुके थे, लेकिन उस दिन बॉम्बर कुछ ज्यादा ही करीब चला गया। टैंकर में बैठे क्रू को भी अंदाजा नहीं लगा इसका। नॉजल टकराए, चिंगारी भड़की और विस्फोट। टैंकर में सवार सभी चार लोग मारे गए, जबकि बॉम्बर के सात क्रू मेंबर्स में से तीन की मौत हुई। चार ने अपनी जान बचाई पैराशूट के ज़रिये।

अगर आप सोच रहे हैं कि पैराशूट से नीचे उतरते अमेरिकी एयरफोर्स के इन अफ़सरों की मुलाकात फ्रांसिस्को से हो गई, तो ऐसा नहीं है। फ्रांसिस्को ने उस दिन पैराशूट में उलझी एक दूसरी ही चीज देखी, जो उनकी आंखों के सामने देखते ही देखते पानी में समा गई। फ्रांसिस्को ने आसमान से नीचे गिरता एक परमाणु बम देखा था। उस दिन के बाद उनका नाम पड़ गया बॉम्ब फ्रैंकी (Bomb Frankie) और पालोमारेस की पहचान में यह बम भी जुड़ गया।

हादसे का शिकार हुए बॉम्बर B-52G पर चार न्यूक्लियर बम लदे थे। इनमें से दो खेतों के बीच पड़े मिले और एक नदी की तलहटी में। यह चौथा बम था, जिसे देखा था फ्रांसिस्को ने। 

पांच दिन बाद इस बम की तलाश शुरू हुई। फ्रांसिस्को की बताई जगह पर उस समय मौजूद आधुनिक से आधुनिक तकनीक के जरिये सागर को छान मारा गया। अमेरिका और स्पेन ने मिलकर चलाया यह अभियान। सैकड़ों डाइवर्स की टीम ने करीब हजार मीटर की गहराई तक हजारों गोते लगाए। 

एक बार हाथ में आकर फिसल गया

एक बार उस बम की झलक दिखी भी, हादसे के करीब डेढ़ महीने बाद 869 मीटर की गहराई में। 11 लाख टन टीएनटी क्षमता की विस्फोटक क्षमता थी इस बम में। इसे बाहर निकालने का काम बहुत ही सावधानी से किया जाना था, लेकिन इसमें लिपटा पैराशूट मुसीबत बन गया। रिकवरी के दौरान बम पकड़ से फिसला और ज्यादा गहरे सागर में समा गया। 

57 साल बाद भी यह बम पालोमारेस के पास, भूमध्य सागर की गहराई में आराम फरमा रहा है। जब-तब बात भी होती है इस पर। जो दो बम जमीन पर गिरे थे, उनकी वजह से कुछ रेडियोएक्टिव पलूशन हुआ, जो अभी तक साफ नहीं हो सका है। इसे लेकर स्पेन कई बार अमेरिका से आग्रह कर चुका है। मार्च 2023 में भी उसने कहा था कि उसकी हजारों वर्गमीटर जमीन रेडियोएक्टिव पलूशन की चपेट में है। इसे दूर करने के लिए अमेरिका कुछ करे।

क्या है तीर का टूट जाना?

परमाणु बम का खो जाना कोई मामूली बात नहीं। वह भी अगर बम पूरी तरह तैयार हो। सोचिए, कौन नहीं खोज में पड़ जाएगा इस घातक हथियार के। लेकिन, परमाणु बम खोते रहे हैं, कभी आसमान से गिरकर तो कभी समुद्र में डूबकर। पालोमारेस की तरह कुल 32 घटनाएं हैं, जिनके बारे में जानकारी है हमें। सैन्य भाषा में इसके लिए एक टर्म है, ब्रोकन ऐरो। वैसे, एक्सपर्ट्स का मानना है कि घटनाएं इससे कहीं ज्यादा होंगी, क्योंकि रूस और चीन जैसे देशों से पूरी जानकारी बाहर नहीं आ पाती।

ब्रोकन ऐरो की ज्यादातर घटनाएं हुई भी हैं शीत युद्ध के दौरान, जब अमेरिका और सोवियत संघ किसी संभावित युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहते थे। ऐसा पहला हादसा हुआ था 14 फरवरी 1950 को। उस दिन भी अमेरिका का ही एक बॉम्बर था, कॉम्बेट मिशन की तैयारी पर। ज़्यादा ऊंचाई पर अधिक ठंड के चलते इसके इंजन जवाब दे गए। विमान पर चार न्यूक्लियर बम लदे थे। 

अमेरिकी एयरफोर्स ने बाद में दावा किया कि इन बम में प्लूटोनियम कोर नहीं थी, जो परमाणु विस्फोट के लिए जरूरी होती है। जब विमान का नीचे गिरना तय हो गया था, तब पायलट ने चारों बम में हवा में विस्फोट कर दिया। हालांकि इस बात पर अब भी बहुत लोगों को भरोसा नहीं। हालांकि कम से कम अमेरिका ने इतना तो माना है कि 1950 से लेकर अभी तक, उसके हाथों तीन परमाणु बम खो चुके हैं। बाकी जो हादसे हुए, उनमें खोए परमाणु बमों को या तो रिकवर कर लिया गया या वे नष्ट हो चुके हैं।

रूस की बात करें, तो 11 अप्रैल 1968 को उसकी एक बैलेस्टिक मिसाइल सबमरीन तीन न्यूक्लियर बैलेस्टिक मिसाइल के साथ प्रशांत महासागर में डूब गई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसकी लोकेशन की भनक अमेरिका को लग गई और उसने डूबे परमाणु हथियारों को हासिल करने के लिए एक सीक्रेट मिशन भी चलाया, लेकिन नाकामी मिली।

सोवियत संघ के साथ 'ब्रोकन ऐरो' वाली सबसे बड़ी घटना हुई 8 अप्रैल 1970 को। उसकी न्यूक्लियर सबमरीन K-8 बिस्के की खाड़ी में समा गई। ऊंची-ऊंची लहरों और ख़तरनाक तूफानों के चलते समुद्री यात्रियों के बीच यह जगह बेहद कुख्यात है। K-8 पर चार न्यूक्लियर टारपीडो थे। इन्हें कभी उस जगह से निकाला नहीं जा सका।

हर बार जब भी ऐसा कोई हादसा होता है, तो सबसे पहला सवाल आता है कि क्या ये बम घातक हो सकते हैं?

इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या बम परमाणु विस्फोट के लिए पूरी तरह से तैयार थे, यानी प्लूटोनियम कोर के साथ। जिन केस में दावा किया गया कि बम नष्ट हो गए हैं, उनमें साथ में एक दावा यह भी था कि बम में केवल विस्फोटक सामाग्री थी, रेडियोएक्टिव तत्व नहीं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अमेरिका का टाइबी द्वीप हादसा। 1958 में विमान से नियंत्रण खोने के बाद पायलट ने बम को पानी में गिरा दिया था। पहले तो कई हफ्तों तक इसकी खोज चली और बाद में अमेरिका ने कह दिया कि इसमें प्लूटोनियम नहीं था। हालांकि विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर इसमें प्लूटोनियम हुआ, तो यह आज भी घातक हो सकता है।

'ब्रोकन ऐरो' की किसी भी घटना में परमाणु विस्फोट नहीं हुआ, तो इसकी एक और वजह यह बताई जाती है कि न्यूक्लियर मटीरियल को बम से दूर रखा जाता है। इसे एकदम आखिरी मिनट में जोड़ते हैं बम से। 

अगर ये बम अब भी एक्टिवेट किए जा सकते हैं, तो इन्हें तलाशा क्यों नहीं जाता?

जवाब है कि कोशिश तो बहुत की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली। खोने वाले अधिकतर परमाणु बम समुद्र की गहराइयों में दफन हैं। मोटे तौर पर इनकी लोकेशन की तो जानकारी है, लेकिन इन्हें वहां से रिकवर करना बहुत मुश्किल। गहराई, खराब मौसम और रिकवरी के दौरान विस्फोट के जोखिम को देखते हुए कोई भी खतरा मोल नहीं लेना चाहता। बेहतर है कि ये जहां हैं, वहीं पड़े रहें। हमेशा के लिए सबकी नजरों से दूर।

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