भारत के 'नागराज', जिनसे अमेरिका ने मांगी मदद
भारतीय जनजाति इरुला का गुजर बसर लगभग सांपों पर ही टिका है। एक समय था, जब इन पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया था, लेकिन अब सांपों के जहर की काट तैयार करने में इनका योगदान अहम है। पूरी रिपोर्ट पढ़िए uplive24.com पर।
1960 के दशक की शुरुआत में अमेरिका में वायरल टीवी प्रोग्राम बनाने का चलन शुरू हो गया था। ऐसे कार्यक्रमों में लोग खतरनाक वन्य जीवों के साथ करतब दिखाते थे। खतरनाक वन्य जीवों में पहले स्थानीय जानवार ही थे, लेकिन फिर मामला पहुंच गया विदेशी जानवरों तक। यही वजह थी कि अमेरिका में दूर देशों से दुलर्भ जानवरों की खेप पहुंचाई जाने लगी। शौक, सर्कस, रिसर्च और दिखावे के लिए लोगों ने बाघ, अजगर, शेर जैसे जानवर भी पालने शुरू किए।
लेकिन, 1980 के दशक में यह शौक कुछ लोगों के लिए सिरदर्द साबित होने लगा। बाकी जानवरों तक तो ठीक था, लेकिन अजगर को लेकर परेशानी ज्यादा बढ़ी। आजिज आकर कुछ लोगों ने अजगरों को जंगल में छोड़ दिया। ऐसा करके उन्होंने अपनी मुश्किल तो हल कर ली, लेकिन पूरे फ्लोरिडा की मुसीबत बढ़ा दी।
फ्लोरिडा के एवरग्लेड्स नैशनल पार्क का मौसम और नमी अजगरों को रास आने लगे और उनकी तादाद तेजी से बढ़ने लगी। फिलहाल, इस पार्क में बर्मीज पायथन यानी अजगरों की लाखों में है। 2012 में एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें बताया गया कि बर्मीज पायथन एवरग्लेड्स नैशनल पार्क में नैचुरल फूड चेन को तबाह कर रहे हैं। वे यहां के कई स्थानीय जानवरों को अपना शिकार बना रहे हैं। इसी साल अमेरिका में बर्मीज पायथन के आयात पर रोक लगा दी गई।
साल 2013 में फ्लोरिडा पायथन चैलेंज शुरू किया गया। यहां सैकड़ों लोग बर्मीज पायथन पकड़ने पहुंचते हैं। इन प्रतियोगिताओं और अन्य उपायों के जरिए अब तक पांच हजार बर्मीज पायथन पकड़े और मारे जा चुके हैं। इन अजगरों की खाल से बैग, जूते, बेल्ट बनाए जाते हैं। यही नहीं, इन अजगरों पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका हर साल 10 लाख अमेरिकी डॉलर खर्च करता है।
अजगरों को पकड़ने की इस प्रतिस्पर्धा में भारत से भी दो लोग हिस्सा ले चुके हैं। इनका नाम है वडिवेल गोपाल और मासी सदाइयां। इन दोनों को पद्मश्री मिल चुका है।
वडिवेल गोपाल और मासी सदाइयां जिगरी दोस्त हैं। दोनों ने कई सांपों को साथ मिलकर रेस्क्यू किया है। ये आते हैं तमिलनाडु के इरुला समुदाय से। इनके बारे में जानने के लिए आपको चलना होगा भारत के सबसे दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के कोयम्बटूर।
चारों तरफ सदाबाहार वन क्षेत्र वाली हर भरी पहाड़ियों से घिरा यह इलाका बेहद खूबसूरत है। यहां जंगलों में चंदन, रोजवुड, सागौन के पेड़ पाए जाते हैं। लेकिन, कोयंबटूर के जंगलों का परिचय इरुला जनजाति के जिक्र के बिना अधूरा है। इरुला सदियों से यहां रहते आए हैं। जंगल इनका घर है और जंगली जीव-जन्तु इनके साथी। जंगल ही इनकी दुनिया है। इरुला जनजाति के लोग पहले सांपों को पकड़ते थे। सांपों को मारकर उनकी खाल बेच देते थे। घर चलाने के लिए उनका मुख्य साधन यही था।
1970 के दशक में सरकार ने वन्य जीव कानून के तहत सांप पकड़ने, पालने, मारने पर रोक लगा दी। इस रोक के बाद इरुला जनजाति की मुश्किल बढ़ गई। उनका रोजगार का साधन ही छिन गया।
इसके बाद एंट्री हुई एक अमेरिकी शख्स की, जिनका नाम था रोमुलस व्हिटेकर। जंगली जीवों के संरक्षण के क्षेत्र में यह नाम काफी बड़ा है। उन्होंने दुनिया के कई हिस्सों में जंगली जीवों की हिफाजत के लिए कई उम्दा कदम उठाए। इरुला जनजाति का रोजगार छिन जाने पर उन्होंने जो किया वह किसी वरदान से कम नहीं। रोमुलस ने ही इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव सोसायटी का गठन किया था।
साल 1978 में की गई यह पहल रंग लाने लगी। कुछ वक़्त बीतने के बाद सरकार ने इस समिति को सांपों का जहर निकालने और उसे दवा कंपनियों को बेचने के लिए अधिकृत कर दिया। शुरू में इस समिति से सिर्फ 11 इरूला जुड़े थे, लेकिन अब इनकी संख्या लगभग 350 है।
सांपों पर काबू पाने में महारथ
जानकार बताते हैं कि इरुला प्रजाति के लोगों के सांप पकड़ने के तरीके हैरान करने वाले और रहस्यमयी लगते हैं। बड़े से बड़े सांप पर वे ऐसे काबू पाते हैं, जैसे किसी खिलौने से खेल रहे हों। इरुला जनजाति के लोग कोबरा, करैत और वाइपर जैसे सांपों का जहर निकालते हैं। इस जहर को भारत में प्रयोगशालाओं को बेचा जाता है, जहां तैयार किया जाता है सांप के काटने पर जहर से बचाने का टीका। हर सांप को चार बार ज़हर निकालने के बाद जंगल में छोड़ दिया जाता है।
ऐसा ज़रूरी नहीं है कि इरुला जनजाति के लोग सभी सांपों का जहर निकालें। सांपों का जहर निकालने के भी कुछ नियम हैं। सांपों को पकड़कर लाए जाने पर पहले उनका मेडिकल चेकअप किया जाता है। स्वस्थ होने पर ही उनका जहर निकाला जाता है। हफ्ते में एक ही बार एक सांप का जहर निकाला जाता है यानी महीने में चार बार। इसके बाद उन पर निशान लगाकर उन्हें जंगल में छोड़ दिया जाता है।
जहर से पाउडर बनाया जाता है और फिर उसे दवा कंपनियों को बेच दिया जाता है। इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव सोसायटी सांपों को मिट्टी के बर्तन, मटके में रखती है। मटकों के अंदर बालू भरा जाता है। एक मटके में अधिकतम दो सांप रखे जाते हैं।
न लोगों को मार्च से अगस्त तक ही सांप पकड़ने की इजाज़त होती है। कितने लोग सांप पकड़ने जाएंगे, इसकी संख्या भी निर्धारित की जाती है। इसके लिए साल में दो बार आदेश जारी होता है। कई बार दवा कंपनियों को सांप का जहर मिलने में देर हो जाती है या जहर मिल ही नहीं पाता। कई बार ऐसे होता है कि सांप पकड़ने वाली समिति के पास स्टॉक ज्यादा हो जाता है, लेकिन बिक्री कम होती है। इससे जहर के खराब होने का भी खतरा बना रहता है।

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